ज्योतिषाचार्य राहुल भारद्वाज ने बताया शरदपूर्णिमा में ब्रत रखने व खीर खाने महत्व

बदायूं-
आचार्य राहुल भारद्वाज ने कहा पूर्णिमा का हिंदू धर्म में महत्व होता है, परंतु आश्विन मास की पूर्णिमा का लक्ष्मी एवं आरोग्यता प्राप्ति के लिए विशेष महत्व होता है इस पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं , शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है। इस दिन कोजागरी व्रत रखा जाता है इसलिए इस पूर्णिमा को कोजगारी पूर्णिमा और कौमुदी व्रत के नाम से भी जानते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा के दिन महारास रचाया था। मान्यता है कि इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है। इस दिन खीर बनाकर रात भर चांदनी में रखने की परंपरा है।
आज शाम 07:03 बजे से पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ होगी जो कि 20 अक्टूबर बुधवार की रात 08 बजकर 20 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के चलते यह पर्व 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा। शरद पूर्णिमा के दिन पूजन चंद्रोदय के बाद किया जाता है अतः इस दिन पूजन का शुभ मुहूर्त शाम 05 बजकर 27 मिनट से चंद्रोदय के बाद रहेगा। मान्यता के अनुसार इस दिन समुद्र मंथन के दौरान मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं अतः शरद पूर्णिमा के दिन मां लक्ष्मी भगवान विष्णु के साथ गरूड़ पर बैठकर पृथ्वी लोक में भ्रमण के लिए आकर घर-घर जाकर भक्तों पर कृपा बरसाती हैं और वरदान देती हैं। मां लक्ष्मी की कृपा से रात्रि जागरण करने बाले लोगों को कर्ज से मुक्ति मिलती है यही कारण है कि इसे कर्ज मुक्ति पूर्णिमा भी कहते हैं। कहते हैं कि इस रात को देखने के लिए समस्त देवतागण भी स्वर्ग से पृथ्वी पर आते हैं।इस रात चंद्रमा की किरणों में औषधीय गुण की मात्रा सबसे अधिक होती है, जो मनुष्य को सभी प्रकार की बीमारियों से छुटकारा दिलाने में सहायक होती हैं।अतः शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर बनाकर उसे खुले आसमान के नीचे चांदी व पीतल के बर्तन में रखकर अगले दिन खीर का प्रसाद लेने से प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत होता है

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